जस्टिस बी.आर. गवई का बड़ा बयान: “न्यायिक सक्रियता कभी न्यायिक आतंकवाद न बने”

जस्टिस बी.आर. गवई का बड़ा बयान: “न्यायिक सक्रियता कभी न्यायिक आतंकवाद न बने”

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, जस्टिस बी.आर. गवई, ने अपने हालिया इंटरव्यू में देश की न्यायिक व्यवस्था, न्यायिक सक्रियता, राजनीतिक दबाव, और राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले बुलडोजर एक्शन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को समाज के अंतिम नागरिक तक न्याय पहुँचाना है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि उसकी भूमिका संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं में ही रहे।

सवालों का बेबाकी से जवाब: न्यायिक सक्रियता पर साफ़ संदेश |इंटरव्यू के दौरान जस्टिस गवई से पूछा गया कि क्या न्यायिक एक्टिविज़्म का बढ़ता दायरा डर पैदा कर रहा है? इस पर उन्होंने कहा: “न्यायिक सक्रियता न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए। हमें संविधान द्वारा दिए गए शक्तियों के विभाजन को समझकर कार्य करना चाहिए।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि देश का संविधान तीनों स्तंभों––विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका––के बीच संतुलन बनाए रखने का स्पष्ट निर्देश देता है।

क्या नागरिक सीधे अदालत जा सकते हैं? जस्टिस गवई ने दी स्पष्टता कई लोग मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में सीधे याचिका डालने से न्यायपालिका पर अनावश्यक भार पड़ता है, इस पर जस्टिस गवई ने बिल्कुल उलट राय रखी। उन्होंने कहा: “देश में ऐसे लाखों लोग हैं जो सामाजिक या आर्थिक बाधाओं के कारण अन्य विकल्पों का उपयोग नहीं कर सकते। ऐसे में यदि वह सीधे अदालत आते हैं तो यह गलत नहीं है।”

उनके अनुसार, यह प्रावधान संविधान के उस वादे को मजबूत करता है जिसमें समाज और देश के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने की बात कही गई है। “सक्रियता की सीमाएं भी होती हैं” — पूर्व CJI जस्टिस गवई ने दोहराया कि न्यायिक सक्रियता जरूरी है, लेकिन इसकी निर्धारित सीमाएं भी हैं। अदालतों को संविधान द्वारा तय दायरे में ही कार्य करना चाहिए। “सक्रियता सकारात्मक हो सकती है, लेकिन यह किसी भी रूप में आतंकवाद का रूप नहीं लेना चाहिए।”

बुलडोजर एक्शन: क्या कानून के दायरे में है? राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले बुलडोजर अभियान पर जस्टिस गवई ने संतुलित लेकिन सख्त राय रखी। उन्होंने कहा: “जहाँ भी नियम-कानून का उल्लंघन हो, नागरिकों को उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता है। अदालतें ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान भी ले सकती हैं।” उन्होंने स्पष्ट बताया कि अदालत उन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई कर सकती है जो कोर्ट के आदेशों की अवमानना करते हैं।

अगर घर अवैध रूप से तोड़ा गया, तो हर्जाना देना ही होगा पूर्व CJI ने इस विषय पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की: “अगर जांच में यह सिद्ध हो जाता है कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी का घर गिराया गया है, तो सरकार को उसकी भरपाई करनी होगी।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार यह खर्च दोषी अधिकारियों या संबंधित व्यक्तियों से वसूल सकती है।

न्यायपालिका का उद्देश्य: समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय जस्टिस बी.आर. गवई ने यह स्पष्ट किया कि कोर्ट का उद्देश्य यह नहीं कि वह शासन की भूमिका निभाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार बाधित न हो। उन्होंने कहा: “न्यायपालिका की भूमिका है– कानूनी प्रक्रिया की रक्षा करना, संतुलन बनाए रखना और सुनिश्चित करना कि न्याय हर किसी तक पहुँचे।”

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