नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़े अधिकांश एग्जिट पोल एनडीए की जीत का अनुमान जता रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह स्थिति 'हार' जैसी ही होगी। यदि राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन चुनाव जीतता है, तो यह भाजपा-जदयू गठबंधन के लिए एक सीधी हार होगी। लेकिन, यदि एग्जिट पोल के अनुमान सही साबित होते हैं और एनडीए की सरकार बनती है, तब भी भाजपा की स्थिति "जीतकर हारे हुए जुआड़ी" जैसी हो सकती है।
इस विश्लेषण का मुख्य आधार यह है कि एग्जिट पोल अगर सही साबित हुए, तो जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की सीटों में भाजपा और राजद के मुकाबले ज्यादा उछाल देखने को मिल सकता है। ज्यादा सीटों का सीधा मतलब होगा- ज्यादा मजबूत नीतीश कुमार। इसका एक स्पष्ट मतलब यह भी होगा कि बिहार में अपना मुख्यमंत्री देखने के लिए भाजपा को अभी और इंतजार करना होगा। गौरतलब है कि बिहार हिन्दी पट्टी का एकमात्र ऐसा प्रमुख प्रदेश है, जहाँ भाजपा आज तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी है।
"ड्राइवर नीतीश और स्टेपनी भाजपा"
साल 2005 से 2025 के बीच के दो दशकों में, दो छोटे अंतरालों को छोड़कर, भाजपा लगभग लगातार बिहार की सत्ता में रही है, मगर उसकी हैसियत गाड़ी की 'स्टेपनी' जैसी रही है। इस राजनीतिक परिदृश्य में नीतीश कुमार 'ड्राइवर' की भूमिका में रहे हैं और उन्होंने अपनी सुविधानुसार 'स्टेपनी' बदली है। जब उन्हें भाजपा से समस्या हुई, तो उन्होंने राजद की स्टेपनी लगा ली और जब राजद से दिक्कत हुई, तो वापस भाजपा का इस्तेमाल कर लिया।
यह छवि केवल पार्टी तक सीमित नहीं रही। बिहार भाजपा का चेहरा रहे सुशील मोदी की छवि भी नीतीश कुमार के एक वफादार सहयोगी या 'स्टेपनी' की ही बनकर रह गई थी। जब नीतीश के समकालीन रहे सुशील मोदी राज्य के डिप्टी सीएम बने, तो इस छवि पर मानो आधिकारिक मुहर लग गई। कई जानकार मानते हैं कि जिस नेता पर 'डिप्टी' का ठप्पा लग जाता है, जनता भी उसे उससे ऊपर प्रमोट होते हुए देखना पसंद नहीं करती।
चेहरे की तलाश में भाजपा
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने देश में ऐतिहासिक विजय प्राप्त की, तब भी बिहार में उसकी किस्मत नहीं पलटी। 2015 के चुनाव में नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा और भाजपा को 243 में से महज 53 सीटों पर संतोष करना पड़ा। यह हार भाजपा के लिए वैसी ही थी जैसी 2009 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में हुई थी।
तमाम उतार-चढ़ाव के बाद, जिस दौर में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा देश में सफलता के कीर्तिमान बना रही थी, उसी दौर में वह बिहार में नीतीश कुमार के 'डिप्टी' की भूमिका से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। भाजपा की बेबसी का आलम यह रहा कि जब 2020 के चुनाव में भाजपा (74 सीटें) ने जदयू (43 सीटें) से कहीं ज्यादा सीटें जीतीं, तब भी उसे नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री स्वीकार करना पड़ा।
उत्तराधिकार का संकट बनाम स्पष्टता
राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि भाजपा बिहार में दीर्घकालीन रणनीति पर काम कर रही है और नीतीश कुमार के जनाधार को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है। लेकिन स्थानीय भाजपा समर्थक भी मानते हैं कि पार्टी के पास बिहार में नीतीश कुमार जैसा कोई 'मॉस लीडर' (जनाधार वाला नेता) नहीं है। सुशील मोदी को हटाने के बाद भाजपा ने जिन चेहरों को आजमाया, उनमें से कोई भी भावी मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित नहीं हो पाया।
दूसरी तरफ, लालू यादव ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकार सफलतापूर्वक तेजस्वी यादव को ट्रांसफर कर दिया है और राजद समर्थक उन्हें अपना नेता मान चुके हैं। लेकिन जदयू में नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी कौन होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
चुनाव प्रचार ने तय की तस्वीर
इस चुनाव में तेजस्वी यादव और राजद ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि चुनाव बाद भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनने देगी। इस बहस के केंद्र में अमित शाह का वह बयान भी आया, जिसमें कहा गया था कि सीएम का निर्णय विधायक दल करेगा। महागठबंधन ने इस मुद्दे को इतना उछाला कि अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह, यहाँ तक कि चिराग पासवान को भी सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि अगला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे।
इसके साथ ही, पहले चरण के मतदान तक जनता के बीच यह साफ हो गया कि उनके सामने मुख्यमंत्री के दो ही मुख्य दावेदार हैं- तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार। 14 नवंबर को मतगणना के बाद यह साफ हो जाएगा कि जनता ने किसे चुना है, मगर एक बात तय है कि देश की सबसे ताकतवर पार्टी भाजपा बिहार में चुनाव जीत भी जाए, तो भी वह अपना मुख्यमंत्री तत्काल नहीं देखने जा रही है। बिहार भाजपा के पास आज भी ऐसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं है, जिसे वह नीतीश के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश कर सके। इसलिए, एग्जिट पोल सही साबित हुए तो भी यह जीत भाजपा के लिए एक 'हार' जैसी होगी, क्योंकि अपना सीएम देखने का उसका सपना एक बार फिर भविष्य के लिए टल जाएगा।
बिहार चुनाव विश्लेषण: एनडीए की जीत भी भाजपा के लिए 'हार' क्यों? सीएम चेहरे का इंतजार और नीतीश की 'ड्राइवर' सीट