आतंकियों की गोलियों ने तोड़ी रीढ़, 17 साल से बिस्तर पर देश का योद्धाः बेटल कैजुअल्टी लाभ की फाइल अटकी, लांसनायक ने सरकार से की मदद की गुहार

आतंकियों की गोलियों ने तोड़ी रीढ़, 17 साल से बिस्तर पर देश का योद्धाः बेटल कैजुअल्टी लाभ की फाइल अटकी, लांसनायक ने सरकार से की मदद की गुहार

यह एक ऐसी तस्वीर है जो किसी को भी विचलित कर सकती है। एक बेटी अपने पिता के पैर पकड़कर उन्हें व्हीलचेयर पर ले रही है, ताकि उन्हें नित्यकर्म के लिए ले जा सके। पिछले 17 सालों से इस परिवार का यही रुटीन है। घर के एक कोने में रखा एक बिस्तर ही लांसनायक सतवीर सिंह की दुनिया बन चुका है। आतंकियों से हुई एक भयंकर मुठभेड़ में लगी गोलियों ने उनकी रीढ़ की हड्डी को तोड़ दिया था, जिसके बाद उनकी कमर से नीचे का शरीर पूरी तरह बेजान हो गया है।

देश की सीमाओं के इस निडर पहरेदार की आज असल लड़ाई खुद अपनी जिंदगी और सरकारी तंत्र की सुस्ती से चल रही है। उन्हें आज भी 'बेटल कैजुअल्टी' (Battle Casualty) के तहत मिलने वाली सरकारी सहायता का इंतजार है।

कलयुग न्यूज की टीम जब इस योद्धा की सुध लेने शेखावाटी के सूरजगढ़ में स्थित उनके गांव कुशलपुरा जाखोद पहुंची, तो खेतों के बीच बने उनके घर पर एक खामोशी पसरी थी। सतवीर सिंह बिस्तर पर लेटे हुए थे। जब हमने उनसे उस आतंकी मुठभेड़ के बारे में बात छेड़ी, तो उनकी आवाज रुंध गई, लेकिन आंखों में एक फौजी की चमक बरकरार थी।

वो काली रात जिसने जिंदगी बदल दी
सतवीर सिंह ने अपनी कहानी बयां करते हुए कहा, "मैं 23 अप्रैल 1998 को सेना में भर्ती हुआ था। मेरी पहली पोस्टिंग उधमपुर में थी। इसके बाद कारगिल युद्ध के दौरान भी मैं रिजर्व टुकड़ी का हिस्सा रहा। बमों और गोलों की आवाजों के बीच शुरू हुए मेरे कॅरियर में मैंने न जाने कितने ही आतंकियों को जहन्नुम पहुंचाया।"
उनकी जिंदगी सही चल रही थी, लेकिन 2004 में श्रीनगर के गांदरबल के घने जंगलों की वह रात उनकी जिंदगी पर भारी पड़ गई।
"हमें आतंकियों के एक समूह के छिपे होने की सूचना मिली थी," सतवीर याद करते हैं, "हमने ऑपरेशन शुरू किया। मुठभेड़ शुरू हो गई। इसी दौरान कुछ गोलियां मेरे शरीर के आर-पार निकल गईं। मेरा एक साथी वहीं शहीद हो गया और मैं खून से लथपथ होकर बेहोश हो गया।"
इसके बाद उन्हें तुरंत एयरलिफ्ट कर कलकत्ता और फिर चंडीगढ़ के सैन्य अस्पतालों में ले जाया गया। उनकी जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। सतवीर बताते हैं, "मेरे 5 साल अस्पतालों में ही गुजर गए। इन 17 सालों में मेरे 15 से ज्यादा जटिल ऑपरेशन हो चुके हैं। आज भी मेरा शरीर गोलियों के उन निशानों से भरा पड़ा है।"

100% दिव्यांग, पर जज्बा कायम
मेडिकल बोर्ड ने सतवीर सिंह को 100% डिसएबल (दिव्यांग) सर्टिफिकेट दिया है। रीढ़ टूटने के बाद शरीर के निचले हिस्से पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। लगातार बिस्तर पर रहने के कारण उन्हें थाइराइड ने भी जकड़ लिया है।

उनके परिवार में उनकी बूढ़ी मां, पत्नी और दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी निशा की सगाई भी उन्होंने एक फौजी से ही की है। सतवीर कहते हैं, "कई बार रात को नींद नहीं आती। सोचता हूं कि जब दोनों बेटियों की शादी हो जाएगी, तो मुझे इस बिस्तर से कौन सरकाएगा? 17 साल हो गए, मैंने बाहर की दुनिया ठीक से नहीं देखी।"
पास बैठी उनकी बेटी निशा, जो अपने पिता की यह कहानी न जाने कितनी बार सुन चुकी है, उसकी आंखें फिर से नम हो जाती हैं। लेकिन इस परिवार का जज्बा देखिए, निशा कहती है, "मैं भी फौज में जाना चाहती हूं। मुझे अपने पिता पर गर्व है।"
सरकारी मदद की फाइल अटकी

सतवीर सिंह को सेना से पेंशन तो मिल रही है, जिससे उनका घर-खर्च और दवाइयों का इंतजाम हो रहा है। लेकिन 'बेटल कैजुअल्टी' के तौर पर राज्य सरकार से मिलने वाली जमीन और अन्य सहायता की फाइल न जाने किन सरकारी दफ्तरों में फंसी हुई है।

उन्होंने रुंधे गले से कहा, "मैं देश के लिए लड़ा, मुझे गर्व है। लेकिन आज मैं लाचार हूं। मेरी बस एक ही गुजारिश है कि सरकार वक्त रहते मेरी सुध ले, ताकि मेरी और मेरे परिवार की शेष जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी। बस कोई वक्त निकालकर हमारी हालत देखने तो आए।"
कलयुगन्यूज इस खबर के माध्यम से सरकार और प्रशासन का ध्यान इस अदम्य साहसी योद्धा की ओर आकर्षित करना चाहता है, जिसने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया और आज वह अपने हक के लिए इंतजार कर रहा है।

शेयर करें: